मन में हमेशा से ही इच्छा थी कि मन की बातों को लिखा जाय पर अपने ही अन्दर एक अंतर्द्वंद चल रहा था - लिख सकूँगा या नहीं, तभी दिमाग ने पूछा - किसके लिए लिखना है, खुद के लिए या दूसरों के लिए? मन ने कहा "खुद के लिए" तो फिर कभी तो कहीं से शुरुआत करनी पड़ेगी? तो आज ही क्यों नहीं?
रोज़ अपने साथ और आस-पास कितना कुछ घटता रहता है जिनमें कुछ बातें / प्रसंग मन पर उस क्षण में गहरा प्रभाव छोड़ देते हैं जो शायद मेरे आस-पास के लोग या तो समझना ही नहीं चाहते, या फिर वह बातें उनको बड़ी Normal लगती होंगी.
अब लगता है कि शायद मैं अपने आपसे बातें कर सकूंगा और शायद कुछ "हम-मिजाज़" दोस्त भी मिल जाएँ जो अपनी प्रतिक्रिया भी दे दें.
शुरुआत करने के लिए आज इतना ही काफी है.